हमारे पितृसत्तात्मक समाज का ढांचा ही ऐसा बुना हुआ है कि स्त्री को अधिकतर मामलों में फैसले लेने का हक नहीं है। फिर चाहे वह देह से जुड़ा हो या जायदाद से। जब कोई स्त्री गर्भधारण करती है या अंतरंग संबंध बनाती है तो वह अपने शरीर की उपयुक्तता के बारे में नहीं सोचती। बल्कि परिवार, समाज की परंपरा और पति की इच्छा का ध्यान रखती है।
from JansattaJansatta https://ift.tt/2SMKpce
via
No comments:
Post a Comment