विकास की बनावट जब से मानवीय से ज्यादा मशीनी हुई है तब से मन और जीवन के बीच से मौलिकता की संभवाना लगातार खारिज होती गई है। आलम यह है कि मौजूदा दौर में हमारा होना किसी रचनात्मक दखल में तब्दील हो, यह चुनौती और बड़ी हो गई है। दरअसल, हम बस उस ‘रुटीन’ के पिछलग्गू बनते जा रहे हैं, जो हर बारह महीने के बाद ‘गया साल, आया साल’ का कोरस गान करता रहता है।
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