हिंदी साहित्य का इतिहास बताता है कि इन प्रेमकथाओं का उन दिनों अच्छा बाजार था। सुनाने वाले को लोग दान-दक्षिणा देते थे। वे जनता के मनोरंजन का माध्यम थीं। अब तक चली आ रही ‘किस्सागोई’ इसी तरह के किस्सों का अवशेष है।
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