‘नई कहानी’ से प्रेम कहानी की कुछ उम्मीद बंधी लेकिन रेणु की ‘तीसरी कसम’ को छोड़ अन्य कोई कहानी ‘प्रेम कहानी’ नहीं नजर आती। आती भी कैसे? अगर हमारे अधिकतर नए कहानीकारों को पहली छोड़ दूसरी-तीसरी प्रेमिकाओं-पत्नियों को पालने-छोड़ने, उनसे लड़ने-झगड़ने से फुरसत होती तब तो वे कोई प्रेमकथा लिखते। प्रेमकथा की जगह वे रिश्तों के टूटने और अतृप्त प्रेम की कहानियां ही कहते रहे।
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