किसी भी देश की जनता के भाग्य—विधाता तो वहां की सरकार ही होती है। लेकिन, आज तक ऐसी कोई भी कोशिश किसी भी सरकार की ओर से की गई नजर नहीं आती जिसमें इन सामाजिक बुराइयों और खामियों को दूर करने का कभी गंभीर प्रयास किया गया हो। उल्टे ठंडी पड़ती आग में अक्सर घी डालने का काम ही सरकारें करती रही हैं।
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