आमतौर पर संन्यासी जीवन को वैराग्यमय माना जाता है, लेकिन यह वर्ग भी अपने जीवन के उद्धार के लिए भागदौड़ ही तो करते हैं। भागदौड़ के लिए दौड़ना ही जरूरी नहीं होता। भागदौड़ के एक मायने यह भी है कि आप एक ही स्थान पर बैठे हैं और मन संसार मे कहीं खोया हुआ है।
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