भारत में भाषाओं के विकास के लिए बड़े-बड़े काम करने की बात तो हमेशा होती रही, लेकिन आश्चर्यजनक है कि देश में भाषाओं से संबंधित दर्जनों विभाग, विश्वविद्यालय और संस्थान होने के बावजूद संस्कृत की स्थिति दयनीय बनी हुई है। इसी तरह कई संस्थानों और हिंदी विश्वविद्यालयों का अस्तित्व राष्ट्रभाषा हिंदी को भी आज तक उसका उचित सम्मान नहीं दिला सका।
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