बकौल रवीश, "किसानों के खाते में हर साल छह हज़ार भेज कर वोट लेने का दंभ इतना बढ गया है कि मंत्री को आंदोलन वाले किसान दलाल नज़र आते हैं। प्राइवेट कंपनियों के प्रति इतनी निष्ठा हो गई है कि जिस किसान का जुबानी जयकार करते थे उसी को दलाल कह रहे हैं।"
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