सर्वोच्च पद पर होना और अपने जीवन और आचरण में भी सर्वोच्च आंका जाना दो जुदा बातें हैं। लोकतांत्रिक ढांचे में सर्वोच्च पदों की तो खासियत ही यह है कि इन पदों पर कोई भी आसीन हो सकता है। लोकतंत्र की इस देन ने हर जगह प्रेरक सुलेख लिखे हैं।
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