मैथिली शरण गुप्त ने लिखा है- ‘हो जाए अच्छी भी फसल, पर लाभ कृषकों को कहां/ खाते, खवाई, बीज ऋण से हैं रंगे रक्खे जहां/ आता महाजन के यहां वह अन्न सारा अंत में/ अधपेट खाकर फिर उन्हें है कांपना हेमंत में!’
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