Sunday, 6 December 2020

ज्ञान सागर: जो यह एक न जानिया, तौ बहु जाने का होय

वेदांत कहता है कि मेरा असली रूप भी सीमित नहीं है मैं भी असीम हूं। उस असीम को जानने के लिए आधार तो सीमित का ही लेना पड़ता है क्योंकि हमारी बुद्धि ने सिर्फ अभी तक सीमित को ही देखा, समझा और जाना है।

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