आमतौर पर विद्वतजन किंवदंतियों को भारतीयता की व्याख्या के लिहाज से या भारतीय लोकमानस की रचना को समझने के लिए खास अहमियत नहीं देते हैं। डॉ. लोहिया इस स्थिति को समझते थे। वे विद्वान तो थे ही तार्किक दृष्टि से भी काफी समृद्ध थे।
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