Thursday, 19 November 2020

दुनिया मेरे आगे: शब्दों की संवेदना

अब सारे अक्षरों में से जीवन के वे रंग गायब हो गए लगते हैं। कुछ खास फॉन्ट में लिखे हुए इन अक्षरों से मन-मस्तिष्क को समझना नामुमकिन है। कितने ही संदेश बड़े एकरूप-से हो गए हैं, अग्रेषित होने लगे हैं! किसी ने कुछ भेजा है, तो वह उस व्यक्ति के मन की वही भावना होगी ही, ऐसा नहीं कह सकते। हर कोई, हर किसी को ‘गुड मॉर्निंग’ कहे जा रहा है। भले ही ‘मॉर्निंग’ में ‘गुड’ जैसा कुछ हो न हो। किसका समय कैसा होता है, यह किसको मालूम! अक्षर अपनी भावनाएं व्यक्त नहीं कर पा रहे तो 'इमोजी' का सहारा लिया जा रहा है। इमोजी से भी बात आधी-अधूरी लगे तो स्टिकरों का सहारा लिया जा रहा है।

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