खुशी के पर्व को लोग व्यसनों से अपने मन को तृप्त करके त्योहार का पूर्ण होना मान लेते हैं। इस मौके पर मदिरा पान, जुआ खेल कर अपना धन बर्बाद करने जैसी कुप्रथाए समाज में लंबे समय से चली आ रही है। आज समय बदल रहा है, लोगों की सोच बदल रही है, वहीं चंद लोग अपनी संकीर्ण मानसिकता को त्याग नहीं पा रहे हैं।
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