सरकारें किसानों को उनकी फसलों की उत्पादन लागत के अनुसार कीमत न देकर प्रतिदिन किसानों की खुदकुशी के अलावा अब अपने पालित डाटा सर्वेक्षण कार्यालयों के मिथ्या सर्वेक्षणों और किसानों के खिलाफ मनमाफिक फैसलों के जरिए प्रदूषण का मुख्य कारण परालीजनित प्रदूषण को बताने में लगी हैं। प्रदूषण के असली कारकों को नजरअंदाज कर सारा दोष किसानों के सिर पर मढ़ कर क्या हासिल कर लिया जाएगा? सवाल यह भी है कि देश में साठ फीसद तक रोजगार देनेवाला कृषि क्षेत्र और अन्नदाता किसानों को पराली को मुद्दा बना कर प्रदूषण का खलनायक बनाने का खेल किसके हित में चल रहा है!
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