अमेरिका के दबाव में भारत पहले ही देर कर चुका है। चीन की आर्थिक महत्त्वाकांक्षा सबके सामने स्पष्ट हो चुकी है। ईरान की कमजोर स्थिति का फायदा उठाने के लिए सवा चार सौ अरब डालर का निवेश करना उसके लिए कोई बड़ी बात नहीं है।
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