शहरों की बेरोजगारी अब बड़ी चिंता समझी जानी चाहिए। जिस तरह से शहर कस्बों में काम-धंधे ठप पड़े हैं, अधखुले बाजारों में सन्नाटा है, खपत बढ़ने की कोई सूरत बनती नजर नहीं आ रही है, उससे तो लगता है कि मंदी का माहौल इतनी जल्दी नहीं बदल सकता। जब तक बाजार में मांग नहीं होगी, तब तक उत्पादन बढ़ने का सवाल ही नहीं है। और जब तक उत्पादन नहीं बढ़ता तब तक रोजगार के मौके बहाल नहीं हो सकते।
from JansattaJansatta https://ift.tt/30RGwTV
via
No comments:
Post a Comment