महाभारत में धर्म की पुनर्स्थापना के लिए जो अधर्म का चरम था वह खुद धर्मराज के अवतार ने किया। गुरु द्रोण का वध वह मोड़ है जहां व्यवस्था को बनाने के लिए व्यवस्था की हत्या को जायज ठहराया जाता है। व्यवस्था इस पर निर्भर करती है कि उसका प्रबंधन कौन कर रहा है। महाभारत के जरिए भारत में राज-समाज को चलाने के नियमों का निर्माण हो रहा था। वंशवाद से लेकर जातिवाद की सामंती व्यवस्था की बुनियाद पड़ रही थी। शिक्षा सीखने और सिखाने वाले के बीच सहज और सरल रिश्ता नहीं रह गया था। धर्म और राजसत्ता के गठजोड़ से इस पर खास वर्ग का वर्चस्व कायम हुआ। द्रोणाचार्य ने जिस गुरुकुल परंपरा की शुरुआत की, वहां ज्ञान को भी पैतृक संपत्ति की तरह अपने वारिसों के लिए ही हस्तांतरणीय बनाया गया। परशुराम से लेकर द्रोण जैसे पौराणिक चरित्रों के जरिए शिक्षा को जिस तरह खास तबके के लिए सुरक्षित रखा गया उस पर बेबाक बोल।
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