भीष्म महाभारत के वो नायक हैं जो सबसे ज्यादा अनिर्णय की स्थिति में रहते हैं। वे भी अर्जुन की तरह ‘मैं’ से ग्रसित हैं। उन्हें लगता है कि वे अपने अनुसार युद्ध का रुख मोड़ सकते हैं और इस कारण श्रीकृष्ण के धर्म की पुनर्स्थापना के लक्ष्य में सबसे बड़े बाधक बन जाते हैं। अर्जुन के बाद भीष्म वो दूसरे व्यक्ति हैं जिन्हें कृष्ण कुरुक्षेत्र के मैदान में उपदेश के लिए चुनते हैं लेकिन रौद्र रूप में। अर्जुन के विपरीत कृष्ण भीष्म को शस्त्र त्यागने के लिए कह उनका वध तय करते हैं। धर्म का मार्ग समय की तरह गतिशील होता है और भीष्म अपनी प्रतिज्ञा के कारण धर्म और अधर्म की ध्रुवीय दूरी में तटस्थ बने रहने का प्रयत्न कर रहे थे। यही तटस्थता नियति की योजनाओं को नकार रही थी। बेबाक बोल में भीष्म के जीवन संदेश पर बात। यह संदेश स्व के ऊपर सामूहिकता के स्वीकार की बात करता है, जिसमें जीवन और धर्म की गतिशीलता में ही भारत का भविष्य देखा गया।
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