कोविड-19 का अनुभव आगे जब भी तारीख में दर्ज होगा तो इसे एक महामारी से ज्यादा लाखों प्रवासी मेहनतकशों की उभरी उस नई शिनाख्त के तौर पर देखा जाएगा, जिसमें एक तरफ तो छले जाने की कभी न भूली जा सकने वाली टीस है, वहीं यह आत्म-साक्षात्कार भी है कि महानगरों में भले उनके लिए संवेदना की एक इंच भी जगह न हो पर विकास और अर्थव्यवस्था के लिए वे आज भी पहली दरकार हैं। कोरोना संक्रमण के बीच मीलों पैदल सड़कों को नापते मजदूरों की दुनिया को लेकर सामयिक विमर्श।
from Jansattaराष्ट्रीय – Jansatta https://ift.tt/2UJjhJt
via
No comments:
Post a Comment