Saturday, 22 February 2020

भाषाई वर्चस्व और मानवाधिकार का संकट

स्वतंत्रता की मूल भावना के अनुरूप ही हम सब अपनी भाषा के प्रति सजग रहें, लेकिन दूसरों की भाषा के प्रति संवेदनशील भी हों। इस सबका एक ही रास्ता है कि वापस गांवों की ओर लौटा जाए और शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार सबका विकेंद्रीकरण हो, जो सुदूर गांवों तक पहुंचे।

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