सदियों पुरानी रिवायतें ढेर हो गई हैं। ऐसे में पत्र कैसे बचता? कभी वक्त था, दिन में दो-दो बार पत्रों के पुलिंदे आते और उनमें हम घंटों खोए रहते। अपनों से मिलने की अनुभूति से सरोबार- आधी मुलाकात जैसे पत्र हमें गहरी संवेदनाओं से समृद्ध कर देते।
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